मकर संक्राति के दिन लोग क्यों खाते है खिचड़ी, जानिए इसकी वजह

हर वर्ष 14 जनवरी को मकर संक्रांति का त्यौहार भारतवर्ष में पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया हाता है। इस दिन भगवान सूर्य की पूजा की जाती है। हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार संक्रांति का अर्थ होता है सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में जाना। इस दिन सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं। सूर्य देव का ऐसा राशि परिवर्तन साल में एक बार ही होता है। सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने से ही सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण होते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस दिन खिचड़ी खाने या तिल का दान करने की परंपरा क्यों शुरु की गई? नहीं तो चलिए जानते हैं मकर संक्रांति से जुड़ी कई विशेष बातें।

मकर संक्रांति सूर्य के उत्तरायण होने का त्यौहार है लेकिन जिस तरह से इस त्यौहार के अवसर पर पूरे उत्तर भारत में खिचड़ी और तिल से बनी चीजें खाने की परंपरा है उससे इस त्यौहार का नाम भी खिचड़ी और तिल संक्रांति हो गया है। देश के कुछ भागों में लोग मकर संक्रांति की बजाय इस त्योहार को खिचड़ी और तिल संक्रांति के नाम से ही पुकारते हैं।
चावल को चन्द्रमा का प्रतीक, उड़द दाल को शनि का और हरी सब्जियां का सम्बन्ध बुध से माना जाता है। इसलिए कहते हैं कि मकर सक्रांति के दिन खिचड़ी खाने से राशि में ग्रहों की स्थिति मजबूत होती है।
इसके पीछे एक और कहानी भी है। मकर संक्रांति को खिचड़ी पर्व बनाने का श्रेय गुरु गोरखनाथ को दिया जाता है। इन्होंने ही मकर संक्रांति पर खिचड़ी बनाने की परंपरा शुरू की थी। ऐसी मान्यता है कि खिलजी के आक्रमण के समय नाथ योगियों को खिलजी से संघर्ष के कारण भोजन बनाने का समय नहीं मिल पाता था। इससे योगी अक्सर भूखे रह जाते थे और कमजोर हो रहे थे।

इस समस्या का हल निकालने के लिए बाबा गोरखनाथ ने दाल, चावल और सब्जियों को एक साथ पकाने कि सलाह दी। यह व्यंजन काफी पौष्टिक और स्वादिष्ट होता था। इससे शरीर को तुरंत ऊर्जा मिलती थी। नाथ योगियों को यह व्यंजन काफी पसंद आया। बाबा गोरख नाथ ने इस व्यंजन का नाम खिचड़ी रख दिया।