Makar Sankranti 2020: इस दिन खिचड़ी का क्‍यों है इतना ज्‍यादा महत्‍व, जानिए इसका पूरा इतिहास

Khichdi

मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी खाने और इसका दान करने का बहुत अधिक महत्‍व है। इसी वजह से इसे खिचड़ी पर्व भी कहा जाता है। इस दिन चावल, काली दाल, नकम, हल्‍दी, मटर और सब्जियां खासकर फुलगोभी डालकर खिचड़ी बनाई जाती है। चावल को चंद्रमा का प्रतीक माना जाता है और काली दाल को शनि का। वहीं हरी सब्जियां बुध से संबंध रखती हैं। खिचड़ी की गर्मी व्‍यक्ति को मंगल और सूर्य से जोड़ती है। इस दिन खिचड़ी खाने से राशि में ग्रहों की स्थिति मजबूत होती है।

दाल, चावल और सब्‍जी को एक साथ पकाने की सलाह

मकर संक्रांति पर खिचड़ी बनाने की परंपरा को शुरू करने वाले बाबा गोरखनाथ थे। मान्‍यता है कि खिलजी के आक्रमण के समय नाथ योगियों को खिलजी से संघर्ष के कारण भोजन बनाने का समय नहीं मिल पाता था। इस वजह से योगी अक्‍सर भूखे रह जाते थे और कमजोर हो रहे थे। रोज योगियों की बिगड़ती हालत को देख बाबा गोरखनाथ ने इस समस्‍या का हल निकालते हुए दाल, चावल और सब्‍जी को एक साथ पकाने की सलाह दी। यह व्‍यंजन पौष्टिक होने के साथ-साथ स्‍वादिष्‍ट भी था। इससे शरीर को तुरंत ऊर्जा भी मिलती है।

गोरखनाथ मंदिर के पास खिचड़ी मेला

बाबा गोरखनाथ ने इस व्‍यंजन का नाम खिचड़ी रख दिया। झटपट तैयार होने वाली खिचड़ी से नाथ योगियों की भोजन की परेशानी का समाधान हो गया और इसके साथ ही वे खिलजी के आतंक को दूर करने में भी सफल हुए। खिलजी से मुक्ति मिलने के कारण गोरखपुर में मकर संक्रांति को विजय दर्शन पर्व के रूप में भी मनाया जाता है। इस दिन गोरखनाथ मंदिर के पास खिचड़ी मेला आरंभ होता है। कई दिनों तक चलने वाले इस मेले में बाबा गोरखनाथ को खिचड़ी का भोग लगाया जाता है और इसे प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है।

खिचड़ी का इतिहास

इतिहास में सिर्फ बीरबल की खिचड़ी ही नहीं थी। भारत आने वाले तमाम विदेशी मुसाफ‍िरों ने भी खिचड़ी का जिक्र किया है। दरअसल यह खेतिहर मजदूरों का शाम का खाना हुआ करता था। केटी आचाया की डिक्‍शनरी ऑफ इंडियन फूड के अनुसार इब्‍न बतूता, अब्‍दुर्र रज्‍जाक और फ्रांसिस्‍को प्‍लेजार्ट ने खिचड़ी के बारे में काफी कुछ लिखा है। 1470 के एक रूसी यात्री अखन्‍सय निकितिन के मुताबिक उस समय खिचड़ी घोड़ों को भी खिलाई जाती थी। आयुर्वेद में भी खिचड़ी का उल्‍लेख मिलता है। चरक संहिता के अनुसार सूर्य के उत्‍तरायण होने का काल ऊर्जा संचरण का काल है, जिसकी शुरुआत खिचड़ी से होती है।

अकबर की खिचड़ी

आइने-अकबरी में सात तरह की खिचड़ी की बात कही गई है। खिचड़ी जहांगीर का प्रिय शाकाहारी भोजन था। जहांगीर को गुजराती खिचड़ी पसंद थी। अंग्रेजों को भी खिचड़ी पसंद थी। उन्‍होंने इसमें अंडे और मछली मिलाकर केडगेरी नाम का नाश्‍ता बना डाला। मिस्‍त्र में कुशारी पकाया जाता है, जो खिचड़ी से मिलता जुलता है। इब्‍न बतूता ने भी किशरी का जिक्र किया था।

मकर संक्रांति को पोंगल भी कहते हैं

देशभर में खिचड़ी के कई अलग रूप हैं। तमिलनाडु में मकर संक्रांति को पोंगल कहा जाता है। पोंगल भी एक तरह का पकवान है, जिसे चावर, मूंगदाल, दूध और गुड़ डालकर पकाया जाता है। उत्‍तर प्रदेश में मूंगदाल की खिचड़ी बनाई जाती है। वहीं पश्चिम बंगाल में मूंग की दाल को भूनकर सुनहरा कर लिया जाता है। बंगाल में दुर्गा पूजा में मां दुर्गा को भोग में खि‍चड़ी जरूर चढ़ाई जाती है। राजस्‍थान और गुजरात में बाजरे की खिचड़ी लोकप्रिय है।

भगवान जगन्‍नाथ के भोग में शामिल है खिचड़ी

हैदराबाद, दिल्‍ली और भोपाल आदि जगह पर दलिया और गोश्‍त को मिलाकर खिचड़ा और हलीम बनाया जाता है। वहीं खिचड़ी भगवान जगन्‍नाथ के 56 भोग में भी शामिल है। मराठी साबूदाने की खिचड़ी बनाते हैं। गुजरात के भरूच में खिचड़ी के साथ कढ़ी दी जाती है।